उत्तराखंड

चमोली: विधि-विधान के साथ बंद हुए रुद्रनाथ मंदिर के कपाट, डोली रवाना हुई गोपेश्वर की ओर


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चमोली : पंचकेदार में से एक, चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ मंदिर के कपाट आज शीतकाल के लिए परंपरागत वैदिक विधियों के साथ बंद कर दिए गए। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मुख्य पुजारी सुनील तिवारी द्वारा अंतिम पूजन और अभिषेक के साथ कपाट बंद होने की प्रक्रिया पूरी की गई। मंदिर परिसर जय भोलेनाथ के नारों से गूंज उठा और श्रद्धालुओं की आंखों में अगले वर्ष पुनः दर्शन की आशा स्पष्ट झलक रही थी।

कपाट बंद होते ही भगवान रुद्रनाथ जी की उत्सव विग्रह डोली अपनी शीतकालीन गद्दीस्थल श्री गोपीनाथ मंदिर, गोपेश्वर के लिए रवाना हो गई। अगले छह महीनों तक श्रद्धालु भगवान रुद्रनाथ के दर्शन और पूजा गोपेश्वर में ही कर सकेंगे। समुद्र तल से 11,808 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर भव्य प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा है। यहाँ पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 19 किलोमीटर की कठिन चढ़ाई करनी होती है, जिसमें कई बुग्याल (घास के मैदान) और पर्वतीय रास्ते पार करने होते हैं। यह यात्रा शिवभक्तों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाती है। रुद्रनाथ मंदिर वह एकमात्र शिवधाम है जहां भगवान शंकर के एकानन (मुख) की पूजा होती है। मान्यता है कि भगवान शिव के शरीर के अन्य अंग पंचकेदार में अलग-अलग स्थानों पर पूजित हैं, जबकि उनका संपूर्ण शरीर नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा जाता है।

मुख्य पुजारी सुनील तिवारी के अनुसार:

“आज सुबह 4 बजे से पूजा प्रारंभ हुई और 6 बजे मंदिर के कपाट विधिवत बंद कर दिए गए। कपाट बंद होने से पूर्व भगवान को 251 मंदार पुष्प गुच्छों से ढका गया। ये पुष्प कपाट खुलने पर प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को वितरित किए जाएंगे।”

डोली यात्रा का मार्ग और विशेष भोग

  • साढ़े सात बजे: डोली रुद्रनाथ से प्रस्थान

  • मार्ग: पंचगंगा → पितृधार → पनार बुग्याल → मोली बुग्याल

  • विशेष भोग: प्रत्येक विश्राम स्थल पर नव अनाज का राजभोग अर्पित किया जाएगा

  • शाम तक: डोली गोपीनाथ मंदिर, गोपेश्वर पहुंचेगी, जहां छह माह तक विराजमान रहेगी

आज रुद्रनाथ मंदिर परिसर में देशभर से आए सैकड़ों श्रद्धालु इस अलौकिक और भावुक क्षण के साक्षी बने। भक्तों ने एक स्वर में भगवान शिव का आह्वान किया और अगले दर्शन की प्रतीक्षा में नतमस्तक हुए। भगवान रुद्रनाथ के कपाट बंद होना एक ओर जहां शीतकाल की शुरुआत का संकेत है, वहीं दूसरी ओर यह भक्तों के विश्वास और आस्था का प्रतीक भी है, जो अगले दर्शन तक और प्रबल होती है।


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