देशी मुर्गियों के संरक्षण में जुटे वैज्ञानिक, जानिए ‘उत्तरा फाउल’ और ‘कड़कनाथ’ नस्ल की खासियतें
उत्तराखंड: पंतनगर विवि को मिला बड़ा शोध प्रोजेक्ट, पहाड़ों में मुर्गीपालन को मिलेगा बढ़ावा
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पंतनगर। गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (AICRP) के तहत कुक्कुट नस्लों के संरक्षण व संवर्धन का एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट भी मिला है। इस पहल से न केवल पर्वतीय क्षेत्रों में मुर्गीपालन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय किसानों की आर्थिकी सशक्त होने के साथ-साथ पलायन पर अंकुश भी लग सकेगा।
मुफ्त मिलेंगे चूजे, तकनीकी मदद भी
इस परियोजना के तहत उत्तराखंड की स्थानीय नस्ल ‘उत्तरा फाउल’ व छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध ‘कड़कनाथ’ नस्ल के चूजे किसानों को मुफ्त दिए जा रहे हैं। इसके साथ ही वैज्ञानिक किसानों को बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग की तकनीकी जानकारी व प्रशिक्षण भी देंगे, ताकि वे अपने घर पर ही सफल मुर्गीपालन भी कर सकें।
पंतनगर में खुला ‘एक्रिप पोल्ट्री केंद्र’
परियोजना अधिकारी डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि यह योजना कुक्कुट अनुसंधान निदेशालय, हैदराबाद के सहयोग से संचालित भी हो रही है। इसके तहत पंतनगर विश्वविद्यालय में ‘एक्रिप पोल्ट्री केंद्र’ की स्थापना की गई है, जहां कुक्कुट प्रजनन पर अनुसंधान व प्रशिक्षण का कार्य किया भी जा रहा है।
कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान व शोध निदेशक डॉ. अजीत सिंह नैन के प्रयासों से यह परियोजना पंतनगर को प्राप्त भी हुई है।
जानिए ‘उत्तरा फाउल’ की विशेषताएं
- हिमालयी क्षेत्र के अनुकूल, रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक
- स्वादिष्ट मांस, अंडे का रंग लाल, वजन लगभग 50 ग्राम
- एक मुर्गी देती है साल में 165-170 अंडे
- तीन से साढ़े तीन माह में एक किलो वजन हासिल करती है
- काले रंग के कारण बाजार में अधिक मांग और बेहतर दाम
- स्वयं अंडों से चूजे निकालने की प्राकृतिक क्षमता रखती है
‘कड़कनाथ’ क्यों है खास?
- इसका काला मांस हृदय रोगियों के लिए लाभकारी
- अंडा हल्के भूरे रंग का, वजन 42-45 ग्राम
- कम वसा, कम कोलेस्ट्रॉल, अधिक प्रोटीन
- विटामिन बी1, बी6, बी12 से भरपूर
- तंत्रिका तंत्र विकारों में भी औषधीय गुण
- मुर्गा 5 माह में 1.5 किलो तक वजन प्राप्त करता है
- मुर्गी देती है साल में 150-180 अंडे
वैज्ञानिकों की टीम
इस परियोजना में डॉ. शिव कुमार, डॉ. एस.के. सिंह, व डॉ. राजीव रंजन कुमार वैज्ञानिक सहायक के रूप में जुड़े हैं।
कुलपति डॉ. चौहान का कहना है कि
इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य न केवल नस्लों का संरक्षण है, बल्कि बैकयार्ड पोल्ट्री के लिए एक पूर्ण तकनीकी पैकेज तैयार करना है ताकि किसान पोषण व आय दोनों में आत्मनिर्भर बन सकें।




