उत्तराखंड

पुलिस हेड कांस्टेबलों के ग्रेड पे मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, DGP को 6 माह में निर्णय का निर्देश


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नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड पुलिस के हेड कांस्टेबलों के ग्रेड पे से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में याचिकाकर्ताओं को ₹4600 ग्रेड पे के लिए नया प्रत्यावेदन पुलिस महानिदेशक (DGP) के समक्ष दाखिल करने की अनुमति भी दे दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि डीजीपी इस प्रत्यावेदन पर प्राप्ति की तारीख से 6 महीने के भीतर फैसला लें।

यह मामला उन हेड कांस्टेबलों का है जिन्हें वर्ष 2001 में सिपाही पद पर नियुक्त भी किया गया था और जो द्वितीय एसीपी के तहत ₹4600 ग्रेड पे की मांग भी कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने 7 जनवरी 2022 के उस शासनादेश को चुनौती भी  दी थी, जिसमें मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद ग्रेड पे देने के स्थान पर ₹2 लाख की एकमुश्त राशि देने का प्रावधान भी किया गया था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे वर्ष 2021 में ही द्वितीय एसीपी के तहत ग्रेड पे के पात्र भी हो चुके थे। राज्य सरकार ने अगली प्रोन्नति का पद 2023 में सृजित असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (ASI) बताया, जिसे याचिकाकर्ताओं ने भ्रामक करार भी दिया। उनका कहना था कि 2023 में पद बनने से 2021 की पात्रता प्रभावित भी नहीं हो सकती।

न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद याचिकाकर्ताओं को नया प्रत्यावेदन दाखिल करने की अनुमति देते हुए मामला निपटा भी दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रत्यावेदन दो सप्ताह के भीतर किया जाए और DGP 6 माह में निर्णय दें।

दूसरा मामला: पोस्टल कर्मचारी से वसूली पर हाईकोर्ट की सख्ती, केंद्र की याचिका खारिज

एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के आदेश को सही ठहराते हुए केंद्र सरकार की याचिका खारिज भी कर दी। यह मामला डाक विभाग के ग्रुप ‘C’ कर्मचारी शूरवीर सिंह नेगी से सेवानिवृत्ति के बाद करीब ₹22 लाख की वसूली से भी जुड़ा था।

नेगी 31 मार्च 2023 को सेवानिवृत्त हुए थे। उनका आरोप था कि बिना कोई कारण बताओ नोटिस व बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए उनसे भारी किराए की वसूली का आदेश दे दिया गया, जबकि उनके पेंशन भुगतान आदेश में कोई बकाया ही नहीं था।

CAT ने वसूली को अवैध बताते हुए आदेश रद्द भी कर दिया था। केंद्र सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने CAT के निर्णय को बरकरार भी रखा।

हाईकोर्ट ने पाया कि—

  • वसूली सेवानिवृत्ति के बाद शुरू की गई,
  • कर्मचारी को “अनधिकृत कब्जाधारी” मानकर दंडात्मक किराया लगाया गया,
  • यह कार्रवाई PP Act के तहत उचित प्रक्रिया अपनाए बिना की गई।

कोर्ट ने CAT के आदेश को सही ठहराते हुए केंद्र सरकार की याचिका खारिज भी कर दी।


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