दून की सड़कों पर मौत बनकर खड़े हैं ट्रक-कंटेनर, लापरवाही पर नहीं लग पा रही लगाम
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देहरादून। राजधानी की सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवैध रूप से खड़े ट्रक और कंटेनर अब हादसों का कारण नहीं, बल्कि मौत का कारण ही बनते जा रहे हैं। हरिद्वार बाईपास, सेलाकुई, रामपुर, आशारोड़ी, और ट्रांसपोर्टनगर जैसे इलाकों में बेतरतीब खड़े भारी वाहन आमजन की जान के लिए खतरा भी बन चुके हैं। इसके बावजूद पुलिस, प्रशासन, और परिवहन विभाग की कार्यशैली सवालों के घेरे में है।
हादसों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा
हाल ही में विकासनगर में एक युवक की मौत सड़क किनारे खड़े ट्रक से टकराने के कारण हो गई। इससे पहले अक्टूबर 2023 में सेंट्रियो मॉल के बाहर खड़े कंटेनर से टकराकर सेना के एक कैप्टन की जान ही चली गई थी।
कुछ प्रमुख हादसे:
- 14 दिसंबर 2024: पांवटा रोड, सुद्धोवाला – बाइक की ट्रक से टक्कर में छात्र की मौत।
- 12 नवंबर 2024: ओएनजीसी चौक – कंटेनर से टकराकर इनोवा सवार 6 युवक-युवतियों की मौत।
- 12 अक्टूबर 2021: सेलाकुई – कंटेनर से भिड़ने पर दो छात्रों की मौत, चार घायल।
इन घटनाओं में एक बात सामान्य रही — सभी हादसे बेतरतीब और बिना किसी चेतावनी के खड़े वाहनों से टकराने से हुए।
राजमार्गों पर जाम और जंजाल का आलम
दून-हरिद्वार, मुरादाबाद, दिल्ली, सहारनपुर और पांवटा राजमार्गों पर ट्रक न केवल अवैध रूप से खड़े होते हैं, बल्कि कहीं मरम्मत कार्य तो कहीं ढाबों के सामने ट्रकों की लंबी कतारें भी देखने को मिलती हैं।
हालात यह हैं कि कई इलाकों में यह मान लिया गया है कि ट्रकों को पार्किंग की अनुमति मिल चुकी है। रात के समय यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है जब बिना रेडियम पट्टी, बिना पार्किंग लाइट वाले ट्रक सड़कों पर ‘अदृश्य खतरा’ बनकर खड़े भी होते हैं।
लापरवाही बनी जानलेवा
रात में ट्रक चालक अक्सर अपने वाहन बिना किसी संकेत के सड़क किनारे खड़े कर देते हैं। तेज रफ्तार वाहन इन्हें देख नहीं पाते और हादसे ही हो जाते हैं। बावजूद इसके, गश्त पर तैनात पुलिसकर्मियों की सक्रियता नगण्य है। थानों को रात्रि गश्त के निर्देश हैं, लेकिन यह केवल कागजों तक ही सीमित नजर आता है।
ओवरलोडिंग और बाहर निकले सरिए भी बड़ा खतरा
अक्सर देखा गया है कि ट्रकों में क्षमता से अधिक माल भरा जाता है, विशेष रूप से लोहे के सरिए और गार्डर जो वाहनों से बाहर निकले रहते हैं। ऐसे वाहनों से टकराने पर हादसे बेहद खतरनाक साबित होते हैं। बावजूद इसके, न तो चालकों पर कार्रवाई होती है, न ही ट्रकों की जांच।
सड़कों पर सिर्फ सेमिनार, धरातल पर नहीं सुरक्षा
सरकारी स्तर पर सड़क सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये के अभियान, गोष्ठियां और सेमिनार होते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर नियमों का पालन न के बराबर है। वाहन चालकों को तो नियमों का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन ट्रक चालकों को समझाने वाला कोई भी नहीं।
जनता की मांग है कि:
- ऐसे वाहनों के लिए निर्धारित पार्किंग क्षेत्र बनाए जाएं।
- रात्रि गश्त को अनिवार्य और सक्रिय किया जाए।
- रेडियम पट्टी और पार्किंग लाइट न लगाने वाले वाहनों पर सख्त चालान हो।
- ओवरलोडिंग और बाहर निकले सामान पर कार्रवाई हो।
राजमार्गों को सुरक्षित बनाना अब प्राथमिकता नहीं, जरूरत बन चुका है। अब देखना होगा कि प्रशासन कब जागता है – हादसे के बाद या पहले।




