UKSSSC पेपर लीक आंदोलन: धामी सरकार की परीक्षा, युवाओं के विश्वास की जीत
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देहरादून | उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की परीक्षा लीक मामले ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासन को हिला कर रख दिया था। महीनों से आंदोलित युवा सड़कों पर थे, “वीक और लीक”, “गद्दी छोड़ो” जैसे नारों से सरकार को घेरने की पूरी कोशिश हो रही थी। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस संघर्ष को एक नया मोड़ दे दिया — जिसमें न केवल सरकार की रणनीति बदली बल्कि युवाओं का नजरिया भी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह आंदोलन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। युवा वर्ग का आक्रोश, सोशल मीडिया पर दबाव, धरनों की तीव्रता और विपक्ष का हमला — इन सबके बीच सरकार को न केवल स्थिति को संभालना था, बल्कि भरोसा भी कायम रखना था। आपको बता दे की कई बार ऐसा प्रतीत हुआ कि सरकार युवाओं की भावनाओं को समझ नहीं पा रही है। लेकिन घटनाक्रम ने बड़ा मोड़ तब लिया जब मुख्यमंत्री धामी ने बिना किसी पूर्व घोषणा के सीधे धरना स्थल पर पहुंचने का निर्णय लिया। यह वह मंच था, जहां कुछ ही दिन पहले उन्हें और उनकी सरकार को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं दी गई थीं। लेकिन वही युवा जिन्होंने नारे लगाए, उन्होंने मुख्यमंत्री का तालियों से स्वागत किया।
वहीं सोमवार की सुबह जब मुख्यमंत्री अचानक परेड ग्राउंड स्थित धरना स्थल पर पहुंचे, तो वहां उपस्थित सभी लोग हैरान रह गए। मुख्यमंत्री के इस निर्णय की जानकारी उनकी फ्लीट में शामिल सिर्फ एक अधिकारी को थी, बाकी स्टाफ को परेड ग्राउंड से कुछ दूरी पर ही इसका पता चला। मुख्यमंत्री के साथ विधायक खजानदास भी थे, जिन्हें इस मिशन की जानकारी रास्ते में दी गई। मुख्यमंत्री ने किसी सलाहकार से इस बार कोई राय नहीं ली। यह निर्णय पूरी तरह से उनका व्यक्तिगत और राजनीतिक अनुभव से उपजा हुआ था।
साथ ही साथ परेड ग्राउंड से मुख्यमंत्री ने सीबीआई जांच की घोषणा की — वहीं से जहां उन्हें पहले विरोध का सामना करना पड़ा था। इस एक कदम ने माहौल को पूरी तरह से पलट दिया। आंदोलनरत युवाओं ने इस फैसले का स्वागत किया और इसे एक “आश्वासन नहीं, एक्शन” के रूप में देखा। वहीं मुख्यमंत्री ने अपने बयान में साफ कहा कि वह युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर हैं और नकल विरोधी कानून को मजबूती से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
वहीं इस पूरे मामले में जहां मुख्यमंत्री की छवि को बल मिला, वहीं सरकार के कुछ सलाहकारों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। कहा जा रहा है कि शुरुआत में सलाहकारों ने मुख्यमंत्री को सीधे संवाद से दूर रखा, जिससे आंदोलन और तीखा हो गया। जिलाधिकारी और एसएसपी को धरना स्थल पर भेजना एक सेफ्टी वाल्व की तरह काम कर गया, जिसने युवाओं को अपनी बात कहने का अवसर दिया। लेकिन अंततः जब मुख्यमंत्री खुद सामने आए, तो न सिर्फ आंदोलन का रुख बदला, बल्कि सरकार के प्रति युवाओं का विश्वास भी बहाल हुआ।
इस पूरे घटनाक्रम का सुखद पहलू यह रहा कि आंदोलन अपने उद्देश्य से भटका नहीं। ना कोई हिंसा हुई, ना ही तोड़फोड़। युवाओं ने लोकतांत्रिक ढंग से अपने हक की लड़ाई लड़ी और समय आने पर बातचीत का रास्ता अपनाया। इससे स्पष्ट होता है कि उत्तराखंड का युवा केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि तर्क और समाधान की राह से भी आगे बढ़ना जानता है। अब जबकि युवा अपने मंच से सरकार को मौका दे चुके हैं, बारी सरकार की है कि वह इन मांगों पर गंभीरता से काम करे। सीबीआई जांच का वादा सिर्फ औपचारिकता न बन जाए, इसके लिए युवाओं की नजरें लगातार सरकार पर रहेंगी। मुख्यमंत्री धामी इस आंदोलन की तपिश में तपे जरूर, लेकिन उन्होंने खुद को एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि के रूप में स्थापित भी किया।




