सिर्फ शिलान्यास तक सिमटीं वन्यजीव संरक्षण की योजनाएं, ज़मीन पर नहीं दिख रहा काम
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देहरादून | उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण को लेकर बनी महत्वाकांक्षी योजनाएं आज भी सिस्टम के जंगल में रास्ता तलाश रही हैं। वर्षों पहले इन योजनाओं के शिलान्यास कार्यक्रम हुए, घोषणाएं हुईं, प्रस्ताव बने लेकिन अब तक ज्यादातर योजनाएं कागज़ों और फाइलों से बाहर नहीं निकल सकीं। ज़मीन पर हालात ये हैं कि वन्यजीवों के इलाज से लेकर उनके संरक्षण तक की कई परियोजनाएं लंबित पड़ी हैं या शुरू ही नहीं हो पाईं।
वन्यजीवों के लिए अस्पताल अब भी सिर्फ योजना
2016 में हल्द्वानी में प्रस्तावित 400 हेक्टेयर में अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर की योजना के साथ ही यहां वन्यजीवों के इलाज के लिए एक विशेष अस्पताल, पशु चिकित्सा कर्मियों के आवास, और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए संस्थान स्थापित करने की योजना बनाई गई थी।
हालांकि, इस परियोजना का शिलान्यास अक्टूबर 2016 में हो गया था, लेकिन आज 9 साल बाद भी इस योजना का काम शुरू नहीं हो सका है। योजना की फाइलें विभागीय दफ्तरों में घूम रही हैं और सिर्फ निदेशक बदले जा रहे हैं।
तराई पूर्वी वन प्रभाग के डीएफओ हिमांशु बांगरी ने जानकारी दी कि इस परियोजना के लिए पीपीआर (प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट) तैयार कर शासन को सौंप दी गई है। अब अगला कदम डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) का निर्माण है। काम तभी शुरू हो पाएगा जब शासन से अनुमोदन मिल जाएगा।
राजाजी टाइगर रिजर्व में नियो नेटल केयर सेंटर अब भी अधर में
राजाजी टाइगर रिजर्व के हाथी कैंप में हाथी के बच्चों की देखभाल के लिए नियो नेटल केयर सेंटर बनाने की योजना पिछले वर्ष घोषित की गई थी। लेकिन इस योजना पर अब तक एक ईंट भी नहीं रखी गई है।
अब योजना को बढ़ाकर हाथियों की उम्र बढ़ने पर उन्हें अलग-अलग स्थानों पर रखने के लिए सेन्टर बनाने का प्रारंभिक खाका तैयार किया जा रहा है। लेकिन इस बात की भी कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं है कि काम कब शुरू होगा।
राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक कोको रोसो का कहना है कि,
“योजना में भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। लेकिन इसके क्रियान्वयन की स्पष्ट तिथि अभी तय नहीं है।”
फसलों को बचाने की बंदरबाड़ा योजना भी फाइलों में दबी
उत्तराखंड के पर्वतीय और तराई क्षेत्र में बंदर और जंगली सूअर फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे किसानों में खेती से मोहभंग की स्थिति बन रही है। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए तराई पूर्वी वन प्रभाग के किशनपुर रेंज में 100 हेक्टेयर क्षेत्र में बंदरबाड़ा बनाने की योजना बनाई गई थी।
इस योजना का भी शिलान्यास हो चुका है, लेकिन यह भी फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी है। किसानों की उम्मीदें अब निराशा में बदल रही हैं।
धराली आपदा से प्रभावित हुआ उत्तरकाशी का काम
उत्तरकाशी वन प्रभाग के डीएफओ डीपी बलूनी ने जानकारी दी कि वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण योजना का पहला चरण अक्टूबर 2025 तक पूरा किया जाना था, लेकिन धराली क्षेत्र में आई आपदा के चलते कार्य प्रभावित हुआ है।
हालांकि उन्होंने आश्वासन दिया कि हालात सामान्य होते ही काम को फिर से शुरू किया जाएगा।
वन्यजीव संरक्षण योजनाएं – खोखले दावे या नीति विफलता?
उत्तराखंड जैसे जैव विविधता संपन्न राज्य में वन्यजीव संरक्षण को लेकर बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि ज्यादातर परियोजनाएं फाइलों में दबकर रह जाती हैं, या फिर प्रारंभिक रिपोर्ट और मंज़ूरी की उलझनों में अटक जाती हैं।
परियोजनाओं का हाल कुछ इस प्रकार है:
| योजना का नाम | शिलान्यास वर्ष | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| हल्द्वानी में अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर व अस्पताल | 2016 | डीपीआर की प्रतीक्षा में |
| बंदरबाड़ा निर्माण योजना (किशनपुर) | 2022 | कार्य शुरू नहीं हुआ |
| नियो नेटल केयर सेंटर (राजाजी) | 2024 | प्रस्ताव स्तर पर |
| उत्तरकाशी वन प्रभाग योजना | 2025 (प्रथम चरण) | आपदा के कारण रुका |
विकास की रफ्तार में वन्यजीव संरक्षण की योजनाएं अक्सर नीति निर्धारकों की प्राथमिकता में पीछे छूट जाती हैं। शिलान्यास से लेकर डीपीआर बनने तक की प्रक्रिया वर्षों में तब्दील हो जाती है, और इस बीच वन्यजीव संघर्ष, मानव जीवन को खतरा और कृषि पर असर लगातार बढ़ता जाता है।
उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी योजनाएं नीति और अमल के बीच की खाई का उदाहरण बन गई हैं। जब तक सरकार और वन विभाग दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, समयबद्ध क्रियान्वयन, और निगरानी व्यवस्था को मजबूत नहीं करेंगे, तब तक ये योजनाएं केवल शिलान्यास समारोहों और प्रेस विज्ञप्तियों तक ही सीमित रह जाएंगी।




