उत्तराखंड की आर्थिक सेहत: कर्ज नियंत्रित, लेकिन चुनौतियां बरकरार
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उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति को सिर्फ राज्य पर मौजूद कर्ज के आंकड़े से नहीं समझा जा सकता। किसी राज्य की आर्थिक स्थिति का आकलन GSDP, NSDP, कुल देनदारियों और Debt-GSDP Ratio जैसे आंकड़ों से किया जाता है। देश में सबसे ज्यादा कर्ज तमिलनाडु पर करीब 9.6 लाख करोड़ रुपये है, जबकि उत्तराखंड पर करीब 80 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। हालांकि, राज्य की वित्तीय तस्वीर इससे कहीं ज्यादा व्यापक है।
कैग के 2024-25 के वास्तविक खातों के मुताबिक, उत्तराखंड की कुल देनदारियां-GSDP अनुपात 2020-21 में 31.66 प्रतिशत था। यह 2021-22 में घटकर 28 प्रतिशत, 2022-23 में 24.89 प्रतिशत, 2023-24 में 24.10 प्रतिशत और 2024-25 में 23.96 प्रतिशत रह गया। यानी पिछले कुछ वर्षों में राज्य की अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में कर्ज का अनुपात नियंत्रित हुआ है।
हालांकि, कर्ज के आंकड़ों में तकनीकी अंतर भी है। कैग के फाइनेंस अकाउंट के अनुसार 31 मार्च 2025 तक व्यापक अर्थ में बकाया देनदारियां 94,666 करोड़ रुपये थीं, जबकि Debt-GSDP Ratio की गणना में 90,657 करोड़ रुपये का आंकड़ा दिया गया है। इसलिए दोनों आंकड़ों को एक समान मानना सही नहीं होगा।
2026-27 के बजट के मुताबिक, उत्तराखंड को कुल 67,526 करोड़ रुपये की राजस्व प्राप्तियां होने का अनुमान है। इसमें राज्य अपने कर और गैर-कर स्रोतों से करीब 31,620 करोड़ रुपये जुटाने का अनुमान लगा रहा है, जबकि केंद्र से करों में हिस्सेदारी और अनुदान के रूप में करीब 35,906 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है। यानी कुल राजस्व प्राप्तियों में करीब 47 प्रतिशत हिस्सा राज्य के अपने संसाधनों और 53 प्रतिशत केंद्र से मिलने वाले संसाधनों का है।
केंद्र से मिलने वाली राशि में 17,415 करोड़ रुपये केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी और 18,491 करोड़ रुपये अनुदान के रूप में मिलने का अनुमान है। ऐसे में राज्य की वित्तीय मजबूती के लिए अपने टैक्स कलेक्शन को बढ़ाना अहम चुनौती है।
2026-27 में राज्य का अपना कर राजस्व करीब 25,913 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इसमें SGST सबसे बड़ा स्रोत है। वहीं गैर-कर राजस्व 5,707 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो 2025-26 के संशोधित अनुमान 5,198 करोड़ रुपये से अधिक है।
पर्यटन और जलविद्युत उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, लेकिन इनका पूरा आर्थिक योगदान सीधे सरकारी राजस्व के रूप में नहीं आता। पर्यटन से रोजगार, होटल, परिवहन और स्थानीय कारोबार को बढ़ावा मिलता है, जबकि जलविद्युत से रॉयल्टी, लाभांश और अन्य गैर-कर प्राप्तियां अलग-अलग मदों में सरकार को मिलती हैं।
2026-27 में राज्य का राजस्व खर्च 64,989 करोड़ रुपये प्रस्तावित है। वहीं पूंजीगत व्यय के लिए 18,153 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान की तुलना में पूंजीगत व्यय में करीब 22 प्रतिशत की वृद्धि प्रस्तावित है। यानी सरकार एक तरफ शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों पर खर्च जारी रख रही है, तो दूसरी तरफ सड़क, परिवहन, कृषि और बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
राज्य के बजट पर वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान का भी बड़ा दबाव है। 2026-27 में वेतन के लिए करीब 22,105 करोड़ रुपये, पेंशन के लिए 11,137 करोड़ रुपये और ब्याज भुगतान के लिए 7,929 करोड़ रुपये का प्रावधान है। तीनों को मिलाकर करीब 41,172 करोड़ रुपये होते हैं, जो अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का लगभग 61 प्रतिशत है।
2026-27 में सरकार ने 2,536 करोड़ रुपये का राजस्व अधिशेष अनुमानित किया है, जो GSDP का करीब 0.6 प्रतिशत है। यह वित्तीय अनुशासन के लिहाज से सकारात्मक संकेत है। लेकिन इसी अवधि में राजकोषीय घाटा 15,989 करोड़ रुपये यानी GSDP का 3.7 प्रतिशत अनुमानित है। 2025-26 के संशोधित अनुमान में यह 3.4 प्रतिशत था।
यानी उत्तराखंड ने पिछले वर्षों में अपने Debt-GSDP Ratio को नियंत्रित रखा है और राजस्व खाते में अधिशेष बनाए रखने की कोशिश की है। लेकिन राज्य की आधे से ज्यादा राजस्व प्राप्तियां केंद्र से आती हैं, जबकि वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे खर्च राजस्व का बड़ा हिस्सा ले जाते हैं।
इसलिए उत्तराखंड के सामने चुनौती सिर्फ कर्ज कम रखने की नहीं है। राज्य को अपने राजस्व स्रोत मजबूत करने, केंद्र पर निर्भरता को संतुलित करने, प्रतिबद्ध खर्च को नियंत्रित रखने और विकास के लिए पूंजीगत निवेश लगातार बढ़ाने की जरूरत है। आने वाले वर्षों में इन सभी के बीच संतुलन ही उत्तराखंड की वित्तीय सेहत की सबसे बड़ी कसौटी होगी।
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