उत्तराखंड के जंगलों में अब दिखेगा तारों भरा ब्रह्मांड, वन विभाग शुरू करेगा एस्ट्रो टूरिज्म
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देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग इको टूरिज्म को नया आयाम देने की तैयारी में भी है। जंगलों की प्राकृतिक शांति व कम प्रकाश प्रदूषण का लाभ उठाते हुए विभाग अब एस्ट्रो टूरिज्म (खगोलीय पर्यटन) शुरू करने की योजना भी बना रहा है। प्रस्तावित योजना के तहत पर्यटक वन विश्राम गृहों व गेस्ट हाउसों में ठहरकर रात के समय तारों, ग्रहों, नक्षत्रों और आकाशगंगा का दुर्लभ नजारा भी देख सकेंगे।
वन विभाग का मानना है कि राज्य के कई वन क्षेत्र एस्ट्रो टूरिज्म के लिए आदर्श भी हैं, जहां कृत्रिम रोशनी बेहद कम होने के कारण रात का आसमान बेहद ही साफ दिखाई देता है। यदि यह योजना धरातल पर उतरती है तो उत्तराखंड देश के प्रमुख एस्ट्रो टूरिज्म गंतव्यों में शामिल भी हो सकता है।
क्या है एस्ट्रो टूरिज्म?
एस्ट्रो टूरिज्म यानी खगोलीय पर्यटन ऐसी गतिविधि है, जिसमें लोग शहरों की चकाचौंध व प्रकाश प्रदूषण से दूर जाकर खुले आसमान में तारों, ग्रहों, नक्षत्रों, मिल्की वे (आकाशगंगा), उल्का वर्षा व अन्य खगोलीय घटनाओं का अवलोकन भी करते हैं।
इस दौरान दूरबीनों व आधुनिक उपकरणों की मदद से विशेषज्ञ पर्यटकों को ब्रह्मांड से जुड़ी रोचक जानकारियां भी देते हैं। कई स्थानों पर स्टार गेजिंग कैंप, नाइट स्काई वॉक व एस्ट्रो फोटोग्राफी जैसी गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं।
जंगल क्यों हैं सबसे उपयुक्त?
वन विभाग के अनुसार संरक्षित वन क्षेत्रों में स्थित अधिकांश गेस्ट हाउस व वन विश्राम गृह शहरों से काफी दूर हैं। यहां प्रकाश प्रदूषण बहुत कम होता है, जिससे तारों व ग्रहों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
ऊंचाई वाले क्षेत्रों में वायुमंडलीय प्रदूषण भी अपेक्षाकृत कम होता है, जो खगोलीय अवलोकन को और बेहतर भी बनाता है। विभाग के पास पहले से मौजूद गेस्ट हाउसों व बंगलों का उपयोग कर इस परियोजना को बिना बड़े निर्माण कार्य के विकसित भी किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के सहयोग से होगी शुरुआत
पीके पात्रो ने बताया कि वन विभाग ने इस दिशा में प्रारंभिक प्रस्ताव तैयार भी किया है। योजना के तहत खगोल विज्ञान व एस्ट्रो टूरिज्म से जुड़े निजी विशेषज्ञों एवं संस्थाओं के साथ साझेदारी भी की जाएगी।
विशेषज्ञों की मदद से दूरबीनें, स्टार मैप, डिजिटल उपकरण व प्रशिक्षण कार्यक्रम उपलब्ध कराए जाएंगे। इससे पर्यटकों को केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि शैक्षणिक व वैज्ञानिक अनुभव भी मिलेगा।
इन क्षेत्रों में शुरू हो सकता है पायलट प्रोजेक्ट
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार पहले चरण में कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट भी शुरू किया जा सकता है। संभावित स्थानों में:
- जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के आसपास का क्षेत्र
- राजाजी टाइगर रिजर्व के वन विश्राम गृह
- चकराता वन प्रभाग
- उत्तरकाशी
- टिहरी
- पिथौरागढ़
- चंपावत
- बागेश्वर
जैसे क्षेत्र शामिल हो सकते हैं, जहां प्रकाश प्रदूषण बेहद कम है व अधिकांश समय मौसम साफ रहता है।
इको टूरिज्म को मिलेगा नया आयाम
वन विभाग की योजना है कि एस्ट्रो टूरिज्म को जंगल सफारी, बर्ड वॉचिंग व नेचर ट्रेल जैसी गतिविधियों के साथ जोड़ा भी जाए। इससे पर्यटक दिन में वन्यजीवों व प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद ले सकेंगे, जबकि रात में तारों भरे आसमान के नीचे ब्रह्मांड की रहस्यमयी दुनिया को करीब से भी देख सकेंगे।
इस पहल से पर्यटकों के ठहराव की अवधि बढ़ने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ भी मिलेगा। स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, एस्ट्रो इंटरप्रेटर व हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद भी है।
संरक्षण और पर्यटन का संतुलन
वन विभाग का कहना है कि एस्ट्रो टूरिज्म पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन गतिविधि है, क्योंकि इसमें बड़े निर्माण कार्यों या प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की आवश्यकता ही नहीं होती। साथ ही यह लोगों को प्राकृतिक अंधेरे के महत्व, प्रकाश प्रदूषण के प्रभाव व खगोल विज्ञान के प्रति जागरूक बनाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
यदि यह योजना सफल होती है, तो आने वाले समय में उत्तराखंड के जंगल सिर्फ जैव विविधता व वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि तारों भरे आसमान व ब्रह्मांड दर्शन के लिए भी दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित भी कर सकते हैं।
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