उत्तराखंड के कारगिल शहीदों की विरासत संभाल रही दूसरी पीढ़ी, वीरांगनाओं ने बेटों को बनाया फौजी
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देहरादून। कारगिल युद्ध में शहादत देने वाले उत्तराखंड के 75 वीर सपूतों की वीरगाथा न केवल इतिहास के पन्नों में ही दर्ज है, बल्कि अब उनकी दूसरी पीढ़ी भी देश की सेवा में अग्रणी भूमिका भी निभा रही है। देवभूमि यूं ही “वीरों की भूमि” नहीं कहलाती — यहां की मिट्टी में जन्मे हर वीर का योगदान देश की सुरक्षा में अमर भी बन गया है।
पति की शहादत के बाद बेटे को बनाया फौजी
कोटद्वार, पौड़ी गढ़वाल निवासी वीरांगना टीना देवी के पति हवलदार मदन सिंह 17 गढ़वाल रेजीमेंट में तैनात भी थे। कारगिल युद्ध में उन्होंने देश के लिए अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए। उस समय उनका बड़ा बेटा रोहित महज 6 वर्ष का था। रोहित बचपन से ही कहता था, “पापा की तरह मुझे भी सेना में ही जाना है।” आज रोहित फौज में शामिल होकर अपने पिता की विरासत को आगे भी बढ़ा रहा है।
हालांकि छोटा बेटा गौतम भी सेना में ही भर्ती होना चाहता था, लेकिन किसी कारणवश वह चयनित भी नहीं हो सका।
कारगिल शहीद की प्रेरणा बना 6 वर्ष का बेटा
अल्मोड़ा निवासी वीरांगना सरस्वती माया घाले के पति नायक हरि बहादुर घाले, द्वितीय नागा रेजीमेंट में तैनात भी थे और कारगिल में शहीद हो गए थे। शहादत के समय उनका बेटा कृष्ण बहादुर भी सिर्फ 6 वर्ष का था। आज वही बेटा 20 कुमाऊं रेजीमेंट में तैनात है और इन दिनों शिलॉंग में देश सेवा भी कर रहा है। सरस्वती बताती हैं कि बेटा बचपन से कहता था, “पापा की तरह मुझे भी वर्दी पहननी है।”
अधूरी सड़कें, अधूरी उम्मीदें
कारगिल में बलिदान देने वाले जवानों के सम्मान में बनाई गई कई विकास योजनाएं आज भी अधूरी ही हैं।
शहीद हरीश सिंह की पत्नी सावित्री देवी ने बताया कि अल्मोड़ा जिले के ग्राम बेवड़ा में उनके पति के नाम पर ही बनाई गई सड़क अब तक पूरी ही नहीं हो सकी है।
इसी तरह पिथौरागढ़ की वीरांगना शांति सामंत ने बताया कि शहीद गिरीश सिंह के नाम पर बनाई गई गांव की सड़क की हालत भी जर्जर है।
कारगिल विजय दिवस की गौरवगाथा
14 जुलाई 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा भी की थी और 26 जुलाई को कारगिल युद्ध की आधिकारिक समाप्ति भी हुई थी। इस ऐतिहासिक जीत की याद में हर वर्ष 26 जुलाई को ‘कारगिल विजय दिवस’ मनाया जाता है। यह दिन देशभक्ति, बलिदान व वीरता की अमर गाथा को याद करने का प्रतीक भी बन चुका है।
उत्तराखंड के वीर जवानों की यह परंपरा आज भी जीवित है — जहां माताएं अपने बेटों को, व पत्नियां अपने शहीद पतियों की विरासत को निभाने के लिए प्रेरित भी कर रही हैं।



