उत्तराखंड में बढ़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष, रेस्क्यू सेंटर फुल; आदमखोर जानवरों को रखने की जगह भी कम पड़ी
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उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। एक ओर गुलदार, बाघ और भालू के हमलों से ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत का माहौल है, वहीं दूसरी ओर वन विभाग के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। खतरनाक और आदमखोर वन्यजीवों को पकड़ने के बाद उन्हें रखने के लिए राज्य के रेस्क्यू सेंटरों में जगह की कमी हो गई है। अधिकांश रेस्क्यू सेंटर अपनी क्षमता तक भर चुके हैं, जिससे वन विभाग की चिंता बढ़ गई है।
पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर और नैनीताल जैसे पर्वतीय जिलों में गुलदारों का आतंक लगातार बढ़ रहा है। कई गांवों में लोग शाम ढलते ही घरों में रहने को मजबूर हैं। बच्चों के स्कूल आने-जाने, किसानों के खेतों में काम करने और ग्रामीणों की रोजमर्रा की गतिविधियों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगली जानवर अब आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं, जिससे भय और नाराजगी दोनों बढ़ रहे हैं।
वन विभाग के सामने सबसे बड़ी समस्या पकड़े गए वन्यजीवों के संरक्षण की है। वर्तमान में प्रदेश में केवल चार प्रमुख रेस्क्यू सेंटर संचालित हैं। इनमें हरिद्वार का चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर, नैनीताल का रानीबाग रेस्क्यू सेंटर, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के ढेला स्थित रेस्क्यू सेंटर और अल्मोड़ा का मिनी जू शामिल हैं। पूरे प्रदेश से पकड़े गए खतरनाक वन्यजीवों की जिम्मेदारी इन्हीं केंद्रों पर है।
वन विभाग के अनुसार अधिकांश रेस्क्यू सेंटर अपनी क्षमता से अधिक वन्यजीवों को संभाल रहे हैं। हरिद्वार के चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर में क्षमता 15 की है, लेकिन यहां करीब 25 गुलदार रखे गए हैं। रानीबाग रेस्क्यू सेंटर में 15 गुलदार और 3 बाघ मौजूद हैं, जबकि इसकी क्षमता भी 15 वन्यजीवों की है। कॉर्बेट के ढेला रेस्क्यू सेंटर में 14 बाघ और 16 गुलदार हैं, जबकि अल्मोड़ा के मिनी जू में भी क्षमता के बराबर 10 गुलदार रखे गए हैं।
एडिशनल प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (APCCF) विवेक पांडे के अनुसार, 1 जनवरी 2025 से 31 जुलाई 2026 के बीच प्रदेश में 106 खतरनाक वन्यजीवों को पकड़ने के आदेश जारी किए गए। इनमें सबसे अधिक 33 आदेश अल्मोड़ा वन प्रभाग में, 13 तराई पश्चिम, 10 पौड़ी, 8 रुद्रप्रयाग, 7 हरिद्वार और 6 बागेश्वर वन प्रभाग में जारी हुए। इससे साफ है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
हाल ही में पौड़ी में पकड़े गए एक गुलदार की पिंजरे में मौत होने के बाद रेस्क्यू व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि क्षमता से अधिक वन्यजीवों को रखने से उनके स्वास्थ्य, उपचार और देखभाल पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
वन विभाग के सामने पशु चिकित्सकों की कमी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। विभाग में वर्तमान में केवल आठ पशु चिकित्सक कार्यरत हैं, जबकि लंबे समय से छह अतिरिक्त चिकित्सकों की मांग की जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्याप्त वन्यजीव चिकित्सकों के अभाव में घायल और बीमार जानवरों का समय पर इलाज करना मुश्किल हो जाता है।
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि राज्य सरकार इस समस्या से पूरी तरह अवगत है और नए रेस्क्यू सेंटर विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। सरकार ने रुद्रप्रयाग, केदारनाथ, बागेश्वर, तराई सेंट्रल, अल्मोड़ा, गढ़वाल, टिहरी, पिथौरागढ़, चंपावत और उत्तरकाशी सहित 10 वन प्रभागों में नए रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार किया है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आदमखोर घोषित जानवरों को पकड़ना या उन्हें मारने की अनुमति देना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक वन्यजीव प्रबंधन, प्राकृतिक आवासों का संरक्षण, रेस्क्यू सेंटरों की क्षमता बढ़ाने और आधुनिक सुविधाओं के विकास की आवश्यकता है। उनका कहना है कि यदि समय रहते आवश्यक संसाधन नहीं बढ़ाए गए, तो आने वाले वर्षों में मानव-वन्यजीव संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है।
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