गिरफ्तारी के समय लिखित आरोप देना पर्याप्त, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
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नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि गिरफ्तारी के समय आरोपी को आरोपों का सार लिखित रूप में भी दे दिया जाता है, तो इसे संवैधानिक प्रावधानों का पालन ही माना जाएगा। आशीष नैथानी की एकल पीठ ने ‘रविकांत बनाम सीबीआई’ मामले में आरोपी की याचिका भी खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता रविकांत ने 9 अक्टूबर 2024 के रिमांड आदेश को चुनौती देते हुए गिरफ्तारी को अवैध भी बताया था। उनका कहना था कि उन्हें गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं बताए गए, जिससे संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन भी हुआ है।
वहीं, सीबीआई ने दलील दी कि गिरफ्तारी मेमो में सभी आवश्यक तथ्य व धाराएं स्पष्ट रूप से दर्ज थीं और आरोपी को यह मेमो गिरफ्तारी के समय ही उपलब्ध भी करा दिया गया था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि गिरफ्तारी के ‘कारण’ और ‘आधार’ अलग-अलग भी होते हैं। यदि गिरफ्तारी मेमो में अपराध से जुड़े बुनियादी तथ्य और धाराएं दर्ज हैं, तो यह कानूनी रूप से भी पर्याप्त है।
मामले में आरोप है कि रविकांत और उनकी पत्नी ने देहरादून में एक कंपनी की जमीन बेचने के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर लोगों से ठगी भी की। सीबीआई के अनुसार, आरोपी ने खुद को कंपनी का अधिकृत निदेशक बताकर लोगों को गुमराह भी किया।
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