H-1B पर सख्ती से बदली तस्वीर, भारतीय पेशेवर अमेरिका के बजाय जर्मनी-ब्रिटेन का रुख कर रहे
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अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर सख्ती, बढ़ती लागत और लगातार बदलते नियमों ने भारतीय पेशेवरों और शोधकर्ताओं के करियर विकल्पों को प्रभावित किया है। बीते एक साल में वीजा शुल्क और प्रक्रिया को लेकर बढ़ी अनिश्चितता के बीच कई भारतीय पेशेवर जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों का रुख कर रहे हैं। कुछ लोग भारत लौटकर करियर और उद्यमिता के नए अवसर तलाशने पर भी विचार कर रहे हैं।
अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स के ताजा आंकड़े इस बदलाव के संकेत देते हैं। अमेरिका में भौतिकी की पढ़ाई कर रहे विदेशी पीएचडी स्कॉलर्स के देश छोड़ने की दर 2023-24 के 16% से बढ़कर 2024-25 में 29% हो गई। यह करीब तीन दशकों में एक साल के भीतर हुई सबसे बड़ी बढ़ोतरी बताई गई है। वहीं, करीब 60% अमेरिकी विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों के आवेदनों में गिरावट दर्ज की गई है। चालू वित्त वर्ष के शुरुआती नौ महीनों में वीजा आवेदनों में भी 10% की कमी आई है।
अमेरिकी मीडिया कंपनी बिजनेस इनसाइडर की पड़ताल में ऐसे कई मामलों का जिक्र है, जहां भारतीय पेशेवरों ने अमेरिका में आगे बढ़ने की संभावनाएं सीमित होने के बाद दूसरे देशों का रुख किया। शिकागो में काम कर रहीं वैज्ञानिक अनन्या जोशी को कंपनी से H-1B स्पॉन्सरशिप नहीं मिली, जिसके बाद उन्हें जर्मनी जाना पड़ा। वहीं, कोलंबिया यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स कर चुकीं सुंजना रमना ने H-1B हासिल करने के लिए तीन बार प्रयास किया। बाद में उन्होंने ब्रिटेन का हाई-पोटेंशियल वीजा हासिल किया और लंदन की एक फिनटेक कंपनी में नौकरी शुरू की। उनका कहना है कि सपने किसी एक देश से नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं और लक्ष्यों से जुड़े होने चाहिए।
H-1B में भारतीयों की बड़ी हिस्सेदारी
H-1B वीजा के आंकड़ों में भारतीय पेशेवरों की बड़ी हिस्सेदारी बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार H-1B लाभार्थियों में भारत की हिस्सेदारी 69.9% यानी 2,83,772 है। चीन की हिस्सेदारी 12.1% यानी 49,161 और अन्य देशों की हिस्सेदारी 18% है।
अमेरिका के साइंस और इंजीनियरिंग क्षेत्र में भी विदेशी मूल के पेशेवरों की भूमिका महत्वपूर्ण है। नेशनल साइंस फाउंडेशन के मुताबिक अमेरिका के साइंस और इंजीनियरिंग वर्कफोर्स में करीब 22% लोग विदेशी मूल के हैं। मास्टर डिग्री धारकों में यह हिस्सेदारी 39% और पीएचडी धारकों में 46% है।
H-1B आवेदनों में 44.5% प्रोफेशनल और तकनीकी सेवाओं से जुड़े हैं। मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 12.1%, आईटी की 9.9% और वित्तीय क्षेत्र की 9% है।
बढ़ी फीस और नीति को लेकर अनिश्चितता
ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल 20 सितंबर को H-1B वीजा की फीस बढ़ाकर एक लाख डॉलर करने की घोषणा की थी। इसके बाद H-1B कर्मचारियों और कंपनियों के बीच यात्रा, नौकरी और स्पॉन्सरशिप को लेकर अनिश्चितता बढ़ी। बाद में कानूनी प्रक्रिया के दौरान इस शुल्क के अमल पर रोक लगी, लेकिन सितंबर 2026 में ट्रंप प्रशासन ने इस नीति को एक साल और बढ़ाने की घोषणा की।
लगातार बदलते नियमों और वीजा प्रक्रिया को लेकर बनी अनिश्चितता का असर उन भारतीय पेशेवरों पर भी पड़ रहा है, जो अमेरिका में लंबे समय तक करियर बनाने की योजना बना रहे हैं। ऐसे में जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों के अलावा भारत भी कुछ पेशेवरों के लिए वैकल्पिक करियर गंतव्य के रूप में उभर रहा है।
भारत में भी बढ़ रहे विकल्प
अमेरिका में अवसरों को लेकर अनिश्चितता बढ़ने के साथ भारतीय पेशेवरों के लिए देश में करियर और उद्यमिता के विकल्प अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भारतीय मूल के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की बड़ी संख्या पहले से ही भारत के स्टार्टअप, आईटी, एआई और अनुसंधान क्षेत्रों से जुड़ी है। इन क्षेत्रों में बढ़ते अवसर विदेशी पेशेवरों की वापसी के लिए एक आधार तैयार कर सकते हैं।
माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट के अनुसार, पिछले दो दशकों में विदेशी प्रतिभाओं के पलायन का ऐसा रुझान नहीं देखा गया है। शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को अमेरिका से जोड़ने वाली पाइपलाइन भी कमजोर होने के संकेत दे रही है। ऐसे में H-1B नीति में बदलाव केवल वीजा व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर अमेरिका की वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करने की क्षमता और भारतीय पेशेवरों के करियर विकल्पों पर भी पड़ रहा है।
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