उत्तराखंड में प्रधानाचार्य संकट गहराया: 85% स्कूलों में नहीं है मुखिया, पदोन्नति से नियुक्ति की बढ़ी मांग
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देहरादून। उत्तराखंड में शासकीय स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट के दौर से भी गुजर रही है। राज्य के 1385 राजकीय इंटर कॉलेजों में से केवल 205 विद्यालयों में नियमित प्रधानाचार्य ही कार्यरत हैं, जबकि 85 प्रतिशत स्कूलों में प्रधानाचार्य के पद रिक्त ही हैं। इस स्थिति को लेकर राजकीय शिक्षक संघ लगातार शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत से संपर्क में भी है और सभी पदों को पदोन्नति के माध्यम से भरने की मांग भी कर रहा है।
हालांकि शिक्षा मंत्री स्वयं अपने गृह जिले पौड़ी की हालत से भी अवगत हैं, जहां 186 स्वीकृत पदों में से केवल 20 स्कूलों में ही प्रधानाचार्य ही तैनात हैं।
इसी तरह टिहरी में 192 में से 26,
चमोली में 126 में से 16,
पिथौरागढ़ में 128 में से 8,
अल्मोड़ा में 166 में से 8,
उत्तरकाशी में 75 में से 3
बागेश्वर में 61 में से केवल 2 प्रधानाचार्य ही शेष बचे हैं।
राष्ट्रीय रिपोर्ट में शिक्षा की स्थिति चिंताजनक
हालांकि विभाग राज्य बोर्ड परीक्षा के बेहतर परिणामों पर आत्ममुग्ध भी है, लेकिन एनसीईआरटी की राष्ट्रीय सर्वेक्षण रिपोर्ट व केंद्र सरकार के परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) में उत्तराखंड की स्थिति खराब भी बताई गई है। PGI में राज्य को 1000 में से केवल 526.3 अंक मिले हैं, जो पिछले साल की तुलना में 11.9 अंकों की गिरावट भी दर्शाता है। इस रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री कार्यालय ने भी स्पष्टीकरण भी मांगा है।
भर्ती परीक्षा को लेकर एससी-एसटी शिक्षक संगठन का विरोध
एससी-एसटी शिक्षक एसोसिएशन ने प्रधानाचार्य पदों पर विभागीय परीक्षा के जरिए सीधी भर्ती के प्रस्ताव का विरोध भी किया है। प्रदेश अध्यक्ष संजय कुमार टम्टा ने आरोप लगाया कि पूर्व में इस परीक्षा का व्यापक विरोध हुआ था और इसे रद्द भी किया गया था, लेकिन अब बिना संशोधन दोबारा से इसे लागू किया जा रहा है, जो वरिष्ठ शिक्षकों के हितों के विरुद्ध भी है।
उन्होंने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगने के कारण एससी-एसटी वर्ग का प्रधानाचार्य पद पर प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त ही हो गया है। 3 प्रतिशत भी प्रतिनिधित्व नहीं रह गया है, इसके बावजूद सरकार उनकी उपेक्षा कर परीक्षा प्रक्रिया को आगे भी बढ़ा रही है।
नियुक्तियों में तेजी की मांग
शिक्षक संघों का कहना है कि अगर सीधी भर्ती प्रक्रिया उत्तराखंड लोक सेवा आयोग से कराई भी जाती है, तो इसमें एक वर्ष से अधिक का समय भी लग सकता है। इससे शिक्षकों की पदोन्नति की राह भी बंद हो जाएगी और विद्यालयों की शैक्षिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा भी सकती है।
अब देखना यह होगा कि शिक्षा मंत्री इस संकट से निपटने के लिए क्या निर्णय लेते हैं – परीक्षा के रास्ते प्रधानाचार्य नियुक्त करते हैं या शिक्षकों की पदोन्नति की मांग को प्राथमिकता भी देते हैं।




