बागेश्वर जिले को बने 29 साल पूरे, विकास के साथ अधूरी उम्मीदों की कसक
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15 सितंबर 1997 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने अल्मोड़ा से अलग कर बागेश्वर को उत्तराखंड का 12वां जिला घोषित किया था। सरयू और गोमती के संगम पर बसे बागेश्वर का धार्मिक, सांस्कृतिक और सामरिक महत्व है। शुरुआत में बागेश्वर, कपकोट और गरुड़ तहसीलों को मिलाकर जिले का गठन हुआ, जिसके बाद कांडा, शामा और दुगनाकुरी समेत कई नई प्रशासनिक इकाइयां अस्तित्व में आईं।
जिला बनने से पहले दुर्गम क्षेत्रों के ग्रामीणों को छोटे-छोटे कामों के लिए अल्मोड़ा जाना पड़ता था। प्रशासनिक दूरी खत्म करने के लिए स्थानीय लोगों, छात्र संगठनों और जन संगठनों ने लंबा आंदोलन चलाया। तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष अल्मोड़ा जोहार सिंह परिहार ने बसपा की रैली में बागेश्वर को जिला और कपकोट को तहसील बनाने की मांग रखी थी। वहीं बागेश्वर जिला बनाओ संघर्ष समिति के नेतृत्वकर्ता स्वर्गीय गुसाईं सिंह दफौटी ने आंदोलन के दौरान कई बार जेल यात्रा की और करीब सात महीने सेंट्रल जेल में बिताए। उन्होंने 1994-95 में नौ से 10 दिन तक आमरण अनशन भी किया।
गुसाईं सिंह दफौटी की पत्नी नीमा दफौटी के मुताबिक, आंदोलन के दौरान उनके पति ने सात महीने जेल में बिताए और परिवार ने भी पुलिस की प्रताड़ना झेली। उनका कहना है कि जिला बनने के बाद भी जिन आंदोलनकारियों ने इसके लिए अपना जीवन समर्पित किया, उन्हें सरकारों ने अपेक्षित सम्मान नहीं दिया।
जिला बनने के बाद प्रशासनिक सुविधाओं का विस्तार हुआ। कलेक्ट्रेट, विकास भवन, जिला अस्पताल, डिग्री कॉलेज और पुलिस लाइन की स्थापना हुई। सड़क नेटवर्क दूरस्थ गांवों तक पहुंचा और मेलाडुंगरी हेलीपैड से हल्द्वानी व दिल्ली के लिए हेली सेवा शुरू होने से यात्रा का समय कम हुआ। कपकोट और गरुड़ नगर पंचायत, शामा उप-तहसील और दुगनाकुरी व काफलीगैर तहसीलों का गठन हुआ। हालांकि कांडा ब्लॉक बनाने की मांग अभी भी जारी है।
29 साल बाद भी जिले में कई बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो पाई हैं। जल संस्थान, एआरटीओ, सेवायोजन, श्रम विभाग और वन निगम अब भी किराये के भवनों से संचालित हो रहे हैं। जिला अस्पताल का अपना भवन नहीं है और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण यह काफी हद तक रेफर सेंटर बनकर रह गया है। युवाओं के लिए अब तक कोई खेल स्टेडियम नहीं बन सका। रोडवेज डिपो बनने के बावजूद कार्यशाला का निर्माण अधूरा है।
बदियाकोट, कुवांरी, बोरबलड़ा और दाबूं हड़ाप जैसे सीमांत क्षेत्रों में ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरयू पुल पर भारी वाहनों की आवाजाही, खस्ताहाल सड़कें, डंपिंग जोन का अभाव और पुराने पुलों की जगह नए स्टील ढांचे बनाने की धीमी रफ्तार जैसे मुद्दे भी कायम हैं।
15 सितंबर 1997 को पहले कलेक्ट्रेट के उद्घाटन के समय दूर-दराज से पहुंचे ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों और छोलिया नृत्य के साथ जश्न मनाया था। लेकिन 29 साल बाद भी रोजगार का सवाल बड़ी चुनौती बना हुआ है। उद्योगपति दलीप सिंह खेतवाल के मुताबिक, जिले में अब तक ऐसा कोई उद्योग स्थापित नहीं हो सका जहां 20 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सके। मैग्नेसाइट फैक्टरी भी घाटे से जूझ रही है।
राज्य आंदोलनकारी रमेश पांडेय का कहना है कि प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचा तो खड़ा हो गया, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे जनसरोकारों से जुड़े कई मुद्दे आज भी पूरी तरह हल नहीं हो पाए हैं। वहीं प्रभारी डीएम एवं एडीएम एनएस नबियाल के मुताबिक, बुनियादी सुविधाओं के विस्तार में प्रगति हुई है और सीमांत क्षेत्रों तक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कमियों को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने के लिए शासन स्तर पर पैरवी की जा रही है।
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