मनचाही तैनाती के लिए शिक्षिकाओं ने अपनाया ‘कागजी तलाक’ का रास्ता, शिक्षा विभाग में मचा हड़कंप
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उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में सुगम क्षेत्रों में मनचाही तैनाती पाने के लिए कुछ शिक्षिकाओं द्वारा कथित तौर पर कागजी तलाक का सहारा लेने के मामले सामने आए हैं। हाल ही में 1500 से अधिक शिक्षकों के तबादलों के दौरान ऐसे मामलों की जानकारी सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। प्रदेश में शिक्षकों और कर्मचारियों के तबादलों के लिए अधिनियम लागू है, लेकिन 18 से 20 साल तक दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देने के बावजूद कई शिक्षिकाएं सुगम क्षेत्रों में तैनाती नहीं पा सकीं।
इस साल विभाग ने अधिनियम की धारा 17(1)(ख) के तहत पांच श्रेणियों में अनुरोध के आधार पर तबादले किए। इनमें माता-पिता या सास-ससुर की बीमारी, तलाकशुदा होना, विधवा या विधुर होना जैसे आधार शामिल थे। विभागीय सूत्रों के अनुसार, कुछ शिक्षिकाओं ने मनचाही तैनाती पाने के लिए पति से कथित तौर पर कागजी तलाक लिया। यहां तक कि कुछ मामलों में तलाक के बाद भी पति अपनी शिक्षिका पत्नी को स्कूल छोड़ने पहुंचते देखे गए, जिससे तलाक की वास्तविकता पर सवाल उठ रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, लंबे समय तक कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में नौकरी करने के बावजूद सुगम क्षेत्र में तैनाती नहीं मिलने पर कुछ शिक्षिकाओं ने यह रास्ता अपनाया। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों की जांच की जा रही है और आरोप सही पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
वहीं, विभाग में ऐसे कई शिक्षक भी हैं, जिनकी पूरी सेवा सुगम क्षेत्रों के विद्यालयों में ही बीती है। इनमें वीआईपी परिवारों से जुड़े शिक्षकों के अलावा अन्य शिक्षक भी शामिल हैं, जो 20 से 25 वर्षों से देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल समेत अन्य जिलों के सुगम क्षेत्रों में तैनात हैं।
इस बार शिक्षा विभाग ने बड़ी संख्या में माता-पिता और सास-ससुर की बीमारी के आधार पर भी शिक्षिकाओं के तबादले किए हैं। तबादला आदेश में स्पष्ट किया गया है कि संबंधित शिक्षिकाओं को शपथ पत्र देना होगा। प्रधानाचार्य को दिए जाने वाले शपथ पत्र में यह स्पष्ट करना होगा कि वे बीमार माता-पिता या सास-ससुर की सेवा करेंगी। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, यदि शिक्षिकाएं इस शर्त का पालन नहीं करती हैं तो उनका तबादला रद्द किया जा सकता है।
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