हिमालय अब सिर्फ बर्फ और ठंड का पर्याय नहीं रह गया है। पर्वतीय क्षेत्र मैदानी इलाकों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहे हैं और इसका सबसे ज्यादा असर 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। हिंदूकुश हिमालय में बर्फ के टिके रहने की अवधि लगातार घट रही है, जबकि जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले इलाकों में पिछले दो दशकों में तापमान करीब एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है।
आईआईटी रुड़की के इंटरनेशनल सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन डैम्स के संयुक्त संकाय सदस्य वैज्ञानिक प्रो. अंकित अग्रवाल के विश्लेषण के मुताबिक, ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में होने वाली असामान्य वृद्धि को ‘ऊंचाई-निर्भर तापन’ कहा जाता है। इसका सीधा असर बर्फ और हिमनदों पर पड़ रहा है। पहलगाम और गुलमर्ग जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी करीब दो दशकों के दौरान तापमान में लगभग एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है।
बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को ‘अल्बीडो प्रभाव’ भी प्रभावित करता है। सफेद बर्फ सूर्य की किरणों को काफी हद तक परावर्तित कर देती है, जबकि बर्फ हटने के बाद सामने आने वाली चट्टान और मिट्टी ज्यादा सौर ऊर्जा सोखती है। इससे जमीन गर्म होती है और बची हुई बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। यानी बर्फ कम होने से गर्मी बढ़ती है और बढ़ती गर्मी बर्फ के पिघलने की रफ्तार और तेज कर देती है।
2013 की केदारनाथ त्रासदी, जुलाई 2023 में हिमाचल प्रदेश की विनाशकारी बाढ़ और अगस्त 2025 में उत्तरकाशी के धराली में कुछ ही मिनटों में आया मलबे का प्रवाह दिखाता है कि हिमालय में मौसम की तीव्र घटनाएं कितनी तेजी से बड़े खतरे में बदल सकती हैं।
अब चुनौती सिर्फ यह जानना नहीं है कि किसी इलाके में कितनी बारिश हुई, बल्कि यह समझना भी जरूरी है कि बारिश कहां, कितनी तेजी से और कितनी देर में हुई। इसके लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम निगरानी केंद्रों का नेटवर्क बढ़ाने, हिमनद झीलों की लगातार निगरानी करने और जोखिम वाले क्षेत्रों में बस्तियों, सड़कों, पुलों और नदियों की पहचान करने की जरूरत है। हिमालय का बढ़ता तापमान सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि पानी, खेती, पर्यटन, सड़क व्यवस्था और पहाड़ी आबादी की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर संकट है।
