उत्तराखंड

मोती हत्याकांड में नदीम और अहसान दोषमुक्त, पुलिस जांच पर उठे सवाल

छह साल आठ माह जेल में बिताने के बाद दोनों आरोपी बरी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और गवाहों की कमी ने तोड़ी केस की रीढ़


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विकासनगर : विकासनगर के चर्चित मोती हत्याकांड में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश नंदन सिंह की अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी नदीम और अहसान को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त करार दिया है। दोनों आरोपी पिछले छह वर्ष आठ माह से जेल में बंद थे। मामले में पुलिस की कहानी न्यायालय में पूरी तरह फेल हो गई। चार्जशीट में पुलिस ने दावा किया था कि मोती की हत्या सिर पर ईंट से वार कर की गई, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर पर कोई चोट नहीं मिली। वहीं मृतक के गले और दायीं जांघ पर गहरे धारदार हथियार के चीरे पाए गए, जिससे पुलिस की थ्योरी कमजोर साबित हुई। 16 जनवरी 2019: मोती सिंह अपने पिता तारा सिंह के साथ त्यूणी से विकासनगर आए। संजय चौहान के साथ बाल कटवाने गया, लेकिन वापस नहीं लौटा। 17 जनवरी 2019: तारा सिंह ने बेटे की गुमशुदगी की सूचना दी। 20 मार्च 2019: दो माह बाद मोती का शव आसन बैराज के गेट नंबर एक पर फंसा हुआ मिला।

पुलिस जांच की लापरवाही तब सामने आई जब यह पता चला कि अहम गवाह संजय चौहान से टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई। संजय के अनुसार, वह और मोती बाजार जा रहे थे, जहाँ मोती कुछ युवकों के साथ कार में चला गया। इन युवकों ने अपना नाम नदीम और अहसान बताया था। लेकिन न्यायालय में यह साबित नहीं हो सका कि वही युवक घटना में शामिल थे। पुलिस ने इस पूरी कड़ी को संदेहास्पद ढंग से पेश किया।

पुलिस ने दावा किया कि मोती की हत्या में प्रयोग की गई ईंट बरामद कर ली गई है, लेकिन ईंट पर मिला खून मोती का है या नहीं, यह पुष्टि नहीं की गई। बरामद कार को भी स्वतंत्र गवाहों के समक्ष नहीं पेश किया गया। धारदार हथियार की बात पोस्टमार्टम में सामने आई, लेकिन पुलिस ने उसकी बरामदगी का कोई विवरण नहीं दिया। पुलिस की चार्जशीट में कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं बताया गया कि मोती की हत्या क्यों की गई। पुलिस ने यह कहानी गढ़ी कि तीनों ने साथ स्मैक पी और नशे में बहस के बाद हत्या कर दी गई। लेकिन यह न तो साबित हो सका, और न ही इसका कोई स्वतंत्र गवाह सामने आया।

अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा। प्रमुख गवाहों की गवाही भ्रमित करने वाली थी। साक्ष्य पर्याप्त नहीं थे कि हत्या के लिए अभियुक्तों को दोषी ठहराया जाए।  इस आधार पर न्यायालय ने नदीम और अहसान को दोषमुक्त कर दिया। क्रिमिनल लॉ विशेषज्ञों के अनुसार, “इस केस में पुलिस की जल्दबाजी और कमजोर जांच ने पूरे केस को नष्ट कर दिया। कोई भी हत्या का मामला केवल कहानी से नहीं, बल्कि पुख्ता फॉरेंसिक और गवाहों की विश्वसनीयता से चलता है।”


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